Puri Rath Yatra 2024 : जानें दर्शन में बदलाव : जग्गनाथ पूरी रथ यात्रा से जुडी रहस्य मय बाते

Puri Rath Yatra 2024 .. पुरी में जगन्नाथोत्सव दुर्लभ मान्यताओं और अनुष्ठानों के साथ हर साल भक्तों के लिए सबसे उत्सुकता से प्रतीक्षित दिन है। आषाढ़ माह में पुरी जगन्नाथ मंदिर में दस दिनों तक चलने वाला यह रथ उत्सव भी भारत के सबसे बड़े रथ उत्सवों में से एक है। इस समारोह में भाग लेने के लिए लाखों श्रद्धालु पुरी आते हैं। इसे दुनिया के सबसे पुराने त्योहारों में से एक होने का गौरव भी प्राप्त है।

पुरी रथ यात्रा 2024 दिनांक और समय

इस साल की पुरी रथ यात्रा रविवार, 7 जुलाई को शुरू होगी। यह नौ दिनों तक चलने वाला समारोह होगा। सूर्योदय: सुबह 5.51 बजे होगा और सूर्यास्त: शाम 7.12 बजे होगा। द्वितीया तिथि का समय 7 जुलाई सुबह 04:26 बजे से लेकर 8 जुलाई सुबह 04:59 बजे तक रहेगा।

भारतीय साहित्य और पुराणों में, जगन्नाथपुरी का वर्णन स्कन्द पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण में किया गया है। इनमें वर्णन है कि लोग कई पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनि के बीच विशाल रथों को सैकड़ों लोग मोटे-मोटे रस्सों से खींचते हैं। प्रारंभ में भाई बलराम जी का रथ प्रस्थान करता है, जिसके थोड़ी देर बाद बहन सुभद्रा जी का रथ चलना शुरू होता है। अंत में लोग जगन्नाथ जी के रथ को बड़े ही श्रद्धापूर्वक खींचते हैं।

Puri Rath Yatra 2024

नारियल के पेड़ की लकड़ी का रथ 

भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथ नारियल की लकड़ी से बनाए जाते हैं। यह लकड़ी हल्की होती है, इसलिए इसे चुना जाता है। भगवान जगन्नाथ के रथ का रंग लाल और पीला होता है। इसके अलावा, यह रथ अन्य रथों की तुलना में आकार में भी बड़ा होता है। उनकी यात्रा बलभद्र और सुभद्रा के रथ के पीछे होती है।

यह पुण्य मिलता है रथ खींचने से

रथ यात्रा के बारे में ऐसी मान्यता है कि जो भी भगवान जगन्नाथ के रथ को खींचता है, उसे फिर जन्म नहीं लेना पड़ता है। इस यात्रा में भाग लेने से इसी जन्म में मुक्ति मिल जाती है। इस कारण से रथ को खींचने के लिए लोगों में बहुत उत्साह रहता है।

ध्वज से जुडी बाते 

भारत में किसी मंदिर का ध्वज हर दिन नहीं बदला जाता है, लेकिन जगन्नाथजी का मंदिर ऐसा एकमात्र स्थान है जहां हर दिन ध्वज बदला जाता है। रोज़ाना, एक पुजारी को ऊँचे गुंबद पर चढ़कर ध्वज को बदलना होता है। इस मंदिर की प्राचीन मान्यता है कि अगर किसी दिन भी ध्वज नहीं बदला गया, तो मंदिर को 18 वर्षों के लिए बंद कर दिया जाएगा।

बहुड़ा यात्रा

रथ यात्रा एक सामुदायिक आनुष्ठानिक पर्व होता है, जिस पर मकानों में कोई पूजा नहीं होती और न ही कोई उपवास रखा जाता है। इस अवसर पर धर्मग्रंथों के अनुसार, किसी भी प्रकार का जातिभेद नहीं किया जाता। जब तक रथ मंदिर वापस नहीं पहुंचते, सभी प्रतिमाएं रथ में ही रहती हैं। आषाढ़ मास की दशमी तिथि को रथ मंदिर की ओर प्रस्थान करते समय, इस यात्रा को “बहुड़ा यात्रा” कहा जाता है। मंदिर के द्वार अनुसार, एकादशी को खोले जाते हैं और फिर विधिवत स्नान करवाकर पुनः प्रतिष्ठा की जाती है।

भगवान जगन्नाथ को समर्पित इस मंदिर का निर्माण 10 वीं शताब्दी में हुआ था, जिसे चार धामों में भी माना जाता है। यहां की एक मान्यता है कि मंदिर की शिखर पर लहराता ध्वज सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। यहां की विशेषता यह है कि दिन के समय हवा समुद्र से लैंड की तरफ चलती है और शाम को उसके विपरीत दिशा में हवा बहती है। इसलिए मंदिर का ध्वज उस विपरीत दिशा में लहराता है, क्योंकि दिन में हवा समुद्र की ओर और रात में मंदिर की ओर बहती है।

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